अजब गजब रहस्य कथा|Top 5 Ajab Gajab Rahasya Katha

अजब गजब रहस्य कथा

Ajab Gajab Rahasya Katha, अजब गजब रहस्य कथा
Ajab Gajab Rahasya Katha

नमस्कार दोस्तो , स्वागत है आप्का नई अजब गजब रहस्य कथा(Ajab Gajab Rahasya Katha) मे । अगर आपको एसी हि और देखनी है , तो हमारी वेबसाइत् की अन्य पोस्त जरुर देखिएगा आपको निस्चित हि पसन्द आयेगा।

इस Ajab Gajab Rahasya Katha (अजब गजब रहस्य कथा) लेख में चित्रित कहानी, सभी नाम, पात्र और घटनाएं काल्पनिक (may be) हैं। वास्तविक व्यक्तियों (जीवित या मृत), स्थानों, इमारतों और उत्पादों के साथ कोई पहचान का इरादा नहीं है या अनुमान लगाया जाना चाहिए।

अजब गजब रहस्य कथा

डेथ वॆली का रहस्य

कभी-कभार कुछ घटनाएं ऐसी घटती हैं जिसके पीछे छिपे कारण को कोई समझ नहीं पाता. यह क्यों हुआ, किस वजह से हुआ यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब खोजना बहुत मुश्किल हो जाता है. वैसे तो विज्ञान कभी चमत्कार या ऐसी किसी भी घटना के होने पर विश्वास नहीं करता लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब विज्ञान के भी पास नहीं होता।

डेथ वैली के नाम से बहुत कम लोग परिचित होंगे क्योंकि अभी इसके बारे में सिर्फ दबी जुबान से ही चर्चाएं होती रहीं लेकिन अब इस वैली का सच शायद बाहर आ रहा है क्योंकि अभी तक ‘नासा’ जो इस वैली और यहां मौजूद पत्थरों की पहेली को सुलझाने की बात कर रहा था

वह भी अब अपने हाथ खड़े कर चुका है क्योंकि उसे भी यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर 700 पाउंड का पत्थर एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे जा सकता है जबकि वहां किसी और के होने का कोई सबूत नहीं है और ना ही वहां कुछ ऐसा है जो इतने भारी पत्थर को हिला पाने तक में सक्षम हो।

कैलिफोर्निया (अमेरिका) स्थित डेथ वैली के तैरते पत्थरों की कहानी लोग सदियों से कहते-सुनते आ रहे हैं लेकिन इन कहानियों पर किसी ने कभी यकीन नहीं किया. लोगों का कहना है कि इस वैली में स्थित पत्थर यहां तैरते हैं, वह अपने आप एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं क्योंकि इस वैली के भीतर कोई जादुई शक्ति है।

लेकिन चमत्कार की अवधारणा को सिरे से नकारने वाला विज्ञान एक बार फिर इस जगह के चमत्कारी होने जैसी बातों को मनगढंत मान रहा है. एक थ्योरी के तहत प्लेनेटरी साइंटिस्ट प्रोफेसर रॉल्फ लॉरेंज ने यह समझाने का प्रयास किया है कि किस तरह यह पत्थर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचते हैं।

प्रोफेसर रॉल्फ का कहना है कि सर्दियों के मौसम में इस वैली के पत्थरों पर बर्फ जम जाती है और जब सर्दियों का मौसम जाते ही इन पत्थरों के ऊपर कीचड़ जम जाता है तो बर्फ छिप जाती है और बर्फ के आवरण से जमी चट्टानों को इस स्थान पर बहने वाली तेज हवा आगे की ओर धकेल देती है और देखने वाले को यह लगता है कि रेत में यह भारी भरकम पत्थर खुद तैरते हुए आगे बढ़ गए हैं, जबकि सच कुछ और ही है। अजब गजब रहस्य कथा|

प्रोफेसर रॉल्फ का कहना है कि जब किसी चट्टान के ऊपर बर्फ की चादर चढ़ जाती है तो उस चट्टान में मौजूद तरल पदार्थों का स्तर बदलते तापमान के साथ-साथ बदलता रहता है और चट्टान आगे पीछे होने लगती है जिससे यह अभास होता है कि यह चट्टान रेत में तैर रही है।

आपको यकीन नहीं होगा कि इस थ्योरी से पहले लोग इस चट्टान के बारे में बहुत कुछ बोलते थे. कोई कहता था कि इन चट्टानों में जादुई शक्तियां हैं तो कोई इस स्थान को एलियन या तंत्र-मंत्र से श्रापित मानता था. अब आपको हो सकता है इस बात पर हंसी आए लेकिन लोग इस स्थान पर मौजूद पत्थरों को अपने घर भी ले गए थे क्योंकि वह इन्हें चमत्कारी मानते थे. प्रोफेसर रॉल्फ के इस स्थान के रहस्य को साफ कर देने के बाद भी लोग इस स्थान पर एलियन और तंत्र विद्या की मौजूदगी को सही मानते हैं।

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इंसान जो पत्थर बन गए


राजस्थान में कई ऐसे मंदिर हैं जिनकी खूबसूरती और रहस्य आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। वहां के सौंदर्य को तो हम अपनी आंखों से देख लेते हैं, लेकिन इन मंदिरों में छिपे उन रहस्यों को नहीं जान पाते जो हमेशा से ही एक राज बना हुआ है। आज हम बात कर रहे हैं ऐसे ही एक मंदिर की जो बाड़मेर जिले के किराडू में है।

कहा जाता है कि यहां पर रात में सोने वाला इंसान या तो हमेशा के लिए सो जाता है या फिर वह पत्थर की शक्ल ले लेता है। बाड़मेर के किराडू मंदिर की हकीकत इसके इतिहास में छिपी है। कोई कहता है कि मुगलों के कई आक्रमण झेलने की वजह से आज यह जगह बदहाल है। लेकिन यहां के स्थानीय लोगों की माने तो एक साधू के शाप ने इस मंदिर को पत्थरों की नगरी में बदल दिया। अजब गजब रहस्य कथा|

ऐसी मान्यता है कि काफी वर्षों पहले यहां एक तापसी साधु अपने शिष्य के साथ रहता था। एकबार वह देशाटन के लिए गया, लेकिन अपने प्रिय शिष्य को गांववालों के भरोसे आश्रम में ही छोड़ गए। उन्हें भरोसा था कि जिस तरह से गांव के लोग उनकी सेवा करते हैं ठीक उसी तरह से उसके शिष्य की भी देखरेख करेंगे।

लेकिन सिवाए एक कुम्हारन किसी ने भी उस अकेले शिष्य की सुध नहीं ली। साधु जब वापस लौटा तो शिष्य को बीमार देखकर वह क्रोधित हो गया। उसने शाप दिया कि जहां के लोगों में दया की भावना न हो वहां जीवन का क्या मतलब, इसलिए यहां के सभी लोग पत्थर के हो जाएं और पूरा शहर बर्बाद हो जाए। फिर क्या था देखते ही देखते सभी पत्थर के हो गए।

सिवाए उस कुम्हारन के, जिसने शिष्य की सेवा की थी। साधु ने उस कुम्हारन से कहा कि तेरे ह्रदय में दूसरों के लिए ममता है इसलिए तू यहां से चली जा। साथ में चेतावनी भी दी कि जाते समय पीछे मुड़कर नहीं देखना वरना तू भी पत्थर की हो जाएगी।


स्टोनहेंज का रहस्य

भले ही विज्ञान ने आज कितनी ही तरक्की क्यों न कर ली हो , फिरभी उसके सामने चुनौतियों का पहाड़ हमेशा ही मुँहबाए खड़ा रहा है . इस श्रृंखला में ऐसे ही कुछ रोचक विषयों की बात की जाएगी , जो आज भी विज्ञान के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं . इस पहेली की पहली कड़ी में हम बात करते हैं ब्रिटेन की धरती पर पाए गए स्टोनहेंज के रहस्यमय पत्थरों की।

यह एक प्रागैतिहासिक काल का ऐसा स्मारक है , जो चट्टान के विभिन्न टुकड़ो को जोड़कर बनाई गई वक्राकार आकृतियाँ हैं , जो मिलकर एक बड़े से गोले के समान दिखाई पड़ती हैं . बहुत से खगोल शास्त्री इसे एक प्राचीन खगोल वेधशाला के रूप में मानते हैं , जिसकी संरचना इतनी जटिल है कि इसे एक प्रागैतिहासिक कम्प्यूटर भी कहा जा सकता है। अजब गजब रहस्य कथा|

ये स्मारक दक्षिणी इंग्लैण्ड के सेलिसबरी के मैदानी इलाकों में स्थित हैं . ये पत्थर लगभग 13 फिट ऊंचे हैं और बलुआ पत्थरों से बने हुए हैं . ऐसा माना जाता है कि इनकी आयु 4 हजार वर्षों से भी अधिक है . पुरातत्व विज्ञान के अनुसार स्टोनहेंज के पत्थर ईसा से 2750 वर्ष पूर्व के हैं . एक मान्यता के अनुसार इनका निर्माण ब्रिटेन और गाल के ड्रुइड ( Druids ) पुजारियों ने किया था . लेकिन आधुनिक पुरातत्वशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं।

उनके अनुसार ये पत्थर ड्रुइड पुजारियों से भी एक हजार साल पुराने हैं . कुछ पुरातत्वशास्त्रियों का मानना ​​है कि इनका निर्माण रोमनों ने किया होगा . जबकि कुछ का मानना ​​है कि इनके निर्माण के पीछे मिस्रियों का हाथ है . उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्टोनहेंज के निर्माण का इतिहास तीन चरणों में विभक्त है।

पहला चरण ईसा से 2750 वर्ष पहले का है , जिसमें स्टोनहेंज के रहस्यमय औब्रे छिद्र ( ऑब्रे छेद) का निर्माण किया गया . इन छिद्रों की संख्या 56 है और इन्हीं के द्वारा स्टोनहेंज की बाहरी परिधि बनी है . पुरातत्वशास्त्रियों का मत है कि इसी दौरान स्टोनहेंज के प्रसिद्ध हील स्टोन (एड़ी स्टोन) का भी निर्माण हुआ , जो मुख्य दरवाजे के बाहर की ओर अवस्थित है ।

स्टोनहेंज की बाहरी परिधि के … भीतर 83 नीले पत्थरों के बने दुहरे वृत्त का निर्माण ईसा से 2000 वर्ष पहले माना जाता है . ऐसा माना जाता है कि ये पत्थर पैम्पशायर एवन ( हैम्पशायर एवन ) से मंगवाए गये थे , जोकि लगभग 4 टन वजनी थे . स्टोनहेंज में पाई गई कुल्हाड़ी आदि भी इसी पत्थर की बनी थी। अजब गजब रहस्य कथा|
इससे यह पता चलता है कि उस दौरान इन पत्थरों को काफी पवित्र माना जाता था . तीसरे चरण में स्टोनहेंज में 75 विशालकाय बलुआ पत्थरों को वहाँ पर लाया गया . ऐसा माना जाता है कि ये पत्थर एवेबुरी से 20 मील दूर के इलाके से लाए गये थे।

उसके बाद इन पत्थरों को तराश गया और तत्पश्चात उन्हें लगभग 18 इंच की ढ़ाल वाली जमीन पर स्थापित किया गया . खगोलशास्त्री एडवर्ड ड्यूक ( Adward ड्यूक ) के अनुसार स्टोनहेंज का पूरा स्मारक सौर प्रणाली को प्रदर्शित करता है और उसमें स्टोनहेंज शनि की कक्षा के समान है जबकि नार्मन लाकयर ( Norrman लॉकयर ) के अनुसार हील स्टोन की स्थिति ग्रीष्मकालीन संक्राति ( मिड गर्मियों संक्रांति ) को प्रकट करता है ।

लेकिन यदि इसे उल्टा करके देखा जाए तो यह शरदकालीन संक्रान्ति ( मिड सर्दियों संक्रांति ) की स्थिति दर्शाता है . उनका अनुमान है कि इनके अध्ययन से विभिन्न प्रकार के कैलेण्डर बनाए जाते होंगे . भले ही आधुनिक खगोलशास्त्री इन मतों से सहमत न हों , पर इतना तो तय हैकि स्टोनहेंज को बनाने के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य रहा होगा . लेकिन वह उद्देश्य क्या होगा , यह भी खगोलशास्त्रियों के लिए चुनौती बना हुआ है| अजब गजब रहस्य कथा|

ताजमहल का रहस्य हिन्दी मे


विश्व के सात अजूबों में से एक, प्रेम का प्रतीक ताजमहल और आगरा आज एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं. अब ताज भारत का गौरव ही नहीं अपितु दुनिया का गौरव बन चुका है. ताजमहल दुनिया की उन 165 ऐतिहासिक इमारतों में से एक है, जिसे राष्ट्र संघ ने विश्व धरोहर की संज्ञा से विभूषित किया है.

इस तरह हम कह सकते हैं कि ताज हमारे देश की एक बेशकीमती धरोहर है, जो सैलानियों और विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है. प्रेम के प्रतीक इस खूबसूरत ताज के गर्भ में मुग़ल सम्राट शाहजहां की सुंदर प्रेयसी मुमताज महल की यादें सोयी हुई हैं, जिसका निर्माण शाहजहां ने उसकी याद में करवाया था।

कहते हैं कि इसके बनाने में कुल बाईस वर्ष लगे थे, लेकिन यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि सम्राट शाहजहां की पत्नी मुमताज की न तो आगरा में मौत हुई थी और न ही उसे आगरा में दफनाया गया था।

मुमताज महल तो मध्य प्रदेश के एक छोटे जिले बुरहानपुर (पहले खंडवा जिले का एक तहसील था) के जैनाबाद तहसील में मरी थी, जो सूर्य पुत्री ताप्ती नदी के पूर्व में आज भी स्थित है. इतिहासकारों के अनुसार लोधी ने जब 1631 में विद्रोह का झंडा उठाया था तब शाहजहां अपनी पत्नी (जिसे वह अथाह प्रेम करता था) मुमताज महल को लेकर बुरहानपुर चला गया।उन दिनों मुमताज गर्भवती थी।

पूरे 24 घंटे तक प्रसव पीड़ा से तड़पते हुए जीवन-मृत्यु से संघर्ष करती रही. सात जून, दिन बुधवार सन 1631 की वह भयानक रात थी, शाहजहां अपने कई ईरानी हकीमों एवं वैद्यों के साथ बैठा दीपक की टिमटिमाती लौ में अपनी पत्नी के चेहरे को देखता रहा. उसी रात मुमताज महल ने एक सुन्दर बच्चे को जन्म दिया, जो अधिक देर तक जिन्दा नहीं रह सका. थोड़ी देर बाद मुमताज ने भी दम तोड़ दिया। अजब गजब रहस्य कथा|

दूसरे दिन गुरुवार की शाम उसे वहीँ आहुखाना के बाग में सुपुर्द-ए- खाक कर दिया गया. वह इमारत आज भी उसी जगह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़ी मुमताज के दर्द को बयां करती है. इतिहासकारों के मुताबिक मुमताज की मौत के बाद शाहजहां का मन हरम में नहीं रम सका. कुछ दिनों के भीतर ही उसके बाल रुई जैसे सफ़ेद हो गए।

वह अर्धविक्षिप्त-सा हो गया. वह सफ़ेद कपड़े पहनने लगा. एक दिन उसने मुमताज की कब्र पर हाथ रखकर कसम खाई कि मुमताज तेरी याद में एक ऐसी इमारत बनवाऊंगा, जिसके बराबर की दुनिया में दूसरी नहीं होगी. बताते हैं कि शाहजहां की इच्छा थी कि ताप्ती नदी के तट पर ही मुमताज कि स्मृति में एक भव्य इमारत बने, जिसकी सानी की दुनिया में दूसरी इमारत न हो।

इसके लिए शाहजहां ने ईरान से शिल्पकारों को जैनाबाद बुलवाया. ईरानी शिल्पकारों ने ताप्ती नदी के का निरीक्षण किया तो पाया कि नदी के किनारे की काली मिट्टी में पकड़ नहीं है और आस-पास की ज़मीन भी दलदली है. दूसरी सबसे बड़ी बाधा ये थी कि तप्ति नदी का प्रवाह तेज होने के कारण जबरदस्त भूमि कटाव था. इसलिए वहां पर इमारत को खड़ा कर पाना संभव नहीं हो सका. उन दिनों भारत की राजधानी आगरा थी। अजब गजब रहस्य कथा|

इसलिए शाहजहां ने आगरा में ही पत्नी की याद में इमारत बनवाने का मन बनाया. उन दिनों यमुना के तट पर बड़े -बड़े रईसों कि हवेलियां थीं. जब हवेलियों के मालिकों को शाहजहां कि इच्छा का पता चला तो वे सभी अपनी-अपनी हवेलियां बादशाह को देने की होड़ लगा दी. इतिहास में इस बात का पता चलता है कि सम्राट शाहजहां को राजा जय सिंह की अजमेर वाली हवेली पसंद आ गई।

सम्राट ने हवेली चुनने के बाद ईरान, तुर्की, फ़्रांस और इटली से शिल्पकारों को बुलवाया. कहते हैं कि उस समय वेनिस से प्रसिद्ध सुनार व जेरोनियो को बुलवाया गया था. शिराज से उस्ताद ईसा आफंदी भी आए, जिन्होंने ताजमहल कि रूपरेखा तैयार की थी. उसी के अनुरूप कब्र की जगह को तय किया गया।

22 सालों के बाद जब प्रेम का प्रतीक ताजमहल बनकर तैयार हो गया तो उसमें मुमताज महल के शव को पुनः दफनाने की प्रक्रिया शुरू हुई. बुरहानपुर के जैनाबाद से मुमताज महल के जनाजे को एक विशाल जुलूस के साथ आगरा ले जाया गया और ताजमहल के गर्भगृह में दफना दिया गया।


इस विशाल जुलूस पर इतिहासकारों कि टिप्पणी है कि उस विशाल जुलूस पर इतना खर्च हुआ था कि जो किल्योपेट्रा के उस ऐतिहासिक जुलूस की याद दिलाता है जब किल्योपेट्रा अपने देश से एक विशाल समूह के साथ सीज़र के पास गई थी. जिसके बारे में इतिहासकारों का कहना है कि उस जुलूस पर उस समय आठ करोड़ रुपये खर्च हुए थे।

ताज के निर्माण के दौरान ही शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने उन्हें कैद कर के पास के लालकिले में रख दिया, जहां से शाहजहां एक खिड़की से निर्माणाधीन ताजमहल को चोबीस घंटे देखते रहते थे. कहते हैं कि जब तक ताजमहल बनकर तैयार होता. इसी बीच शाहजहां की मौत हो गई।

मौत से पहले शाहजहां ने इच्छा जाहिर की थी कि “उसकी मौत के बाद उसे यमुना नदी के दूसरे छोर पर काले पत्थर से बनी एक भव्य इमारत में दफ़न किया जाए और दोनों इमारतों को एक पुल से जोड़ दिया जाए”, लेकिन उसके पुत्र औरंगजेब ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने की बजाय, सफ़ेद संगमरमर की उसी भव्य इमारत में उसी जगह दफना दिया, जहां पर उसकी मां यानि मुमताज महल चिर निद्रा में सोईं हुई थी। अजब गजब रहस्य कथा|

उसने दोनों प्रेमियों को आस-पास सुलाकर एक इतिहास रच दिया. बुहरानपुर पहले मध्य प्रदेश के खंडवा जिले की एक तहसील हुआ करती थी, जिसे हाल ही में जिला बना दिया गया है. यह जिला दिल्ली-मुंबई रेलमार्ग पर इटारसी-भुसावल के बीच स्थित है. बुहरानपुर रेलवे स्टेशन भी है, जहां पर लगभग सभी प्रमुख रेलगाड़ियां रुकती हैं।

बुहरानपुर स्टेशन से लगभग दस किलोमीटर दूर शहर के बीच बहने वाली ताप्ती नदी के उस पर जैनाबाद (फारुकी काल), जो कभी बादशाहों की शिकारगाह (आहुखाना) हुआ करती थी, जिसे दक्षिण का सूबेदार बनाने के बाद शहजादा दानियाल ( जो शिकार का काफी शौक़ीन था) ने इस जगह को अपने पसंद के अनुरूप महल, हौज, बाग-बगीचे के बीच नहरों का निर्माण करवाया था, लेकिन 8 अप्रेल 1605 को मात्र तेईस साल की उम्र मे सूबेदार की मौत हो गई. स्थानीय लोग बताते हैं कि इसी के बाद आहुखाना उजड़ने लगा।

स्थानीय पत्रकार कहते हैं कि जहांगीर के शासन काल में सम्राट अकबर के नौ रतनों में से एक अब्दुल रहीम खानखाना ने ईरान से खिरनी एवं अन्य प्रजातियों के पौधे मंगवाकर आहुखाना को पुनः ईरानी बाग के रूप में विकसित करवाया।

इस बाग का नाम शाहजहां की पुत्री आलमआरा के नाम पर पड़ा. बादशाहनामा के लेखक अब्दुल हामिद लाहौरी साहब के मुताबिक शाहजहां की प्रेयसी मुमताज महल की जब प्रसव के दौरान मौत हो गई तो उसे यहीं पर स्थाई रूप से दफ़न कर दिया गया था, जिसके लिए आहुखाने के एक बड़े हौज़ को बंद करके तल घर बनाया गया और वहीँ पर मुमताज के जनाजे को छह माह रखने के बाद शाहजहां का बेटा शहजादा शुजा, सुन्नी बेगम और शाह हाकिम वजीर खान, मुमताज के शव को लेकर बुहरानपुर के इतवारागेट-दिल्ली दरवाज़े से होते हुए आगरा ले गए।

जहां पर यमुना के तट पर स्थित राजा मान सिंह के पोते राजा जय सिंह के बाग में में बने ताजमहल में सम्राट शाहजहां की प्रेयसी एवं पत्नी मुमताज महल के जनाजे को दोबारा दफना दिया गया. यह वही जगह है, जहां आज प्रेम का शाश्वत प्रतीक, शाहजहां-मुमताज के अमर प्रेम को बयां करता हुआ विश्व प्रसिद्ध “ताजमहल” खड़ा है। अजब गजब रहस्य कथा|

आर्कटिक का रहस्य


मास्को : रूसी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने अंटार्कटिक की बर्फ के नीचे दबी दो करोड़ साल पुरानी एक झील में छेद करने में सफलता हासिल कर ली है। इससे झील के नीचे के जीवन के बारे में अनोखी और अद्भुत जानकारी मिलने की उम्मीद बंधी है। रूसी संवाद समिति रिया नोवोस्ती के अनुसार, अंटार्कटिक में लेक वोस्तोक में बर्फ के नीचे चार किमी की गहराई पर छेद किया गया है।

एक सूत्र ने बताया, ‘हमारे वैज्ञानिकों ने 3768 मीटर की गहराई तक छेद किया और वे झील की सतह तक पहुंचने में कामयाब हो गए। झील का पानी चलायमान है लेकिन बर्फ के नीचे चार किलोमीटर की गहराई पर होने के बावजूद वहां आक्सीजन की आपूर्ति पायी गई है।

इसके साथ ही खोदी गई बर्फ में पहले ही सूक्ष्म जीवाणु पाए गए हैं।’ रूसी विज्ञान अकादमी में खगोल विज्ञान विभाग के निदेशक डॉ. व्लादीमिर कोतल्याकोव ने बताया, ‘लेक वोस्तोक में सूक्ष्म जीवाणुओं की खोज का मतलब हो सकता है कि यूरोप में कहीं और भी जीवन है।’ डेली मेल में प्रकाशित समाचार में बताया गया है कि रूसी आर्कटिक और अंटार्कटिक शोध संस्थान के विशेषज्ञ अब झील से लिए गए पानी के नमूने की जांच करेंगे।

इस बीच, सरकारी रूसी संवाद समिति ने दावा किया है कि जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर के अभिलेखागार का बहुमूल्य गुप्त भंडार इसी जगह के समीप किसी बर्फ के बंकर में दबा हो सकता है। रिया नोवोस्ती ने कहा, ‘ऐसा समझा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के दिनों में नाजी दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ गए थे और उन्होंने लेक वोस्तोक में अड्डे का निर्माण शुरू कर दिया था।’

संवाद समिति ने एडमिरल कार्ल दोंतीज के 1943 के उस बयान का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया था, ‘जर्मन के पनडुब्बी बेड़े को इस बात का गर्व है कि उसने हिटलर के लिए अंटार्कटिक में ‘दुनिया के दूसरे छोर पर’ एक अभेद्य किला बना लिया है। अजब गजब रहस्य कथा|

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